जानिए पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की वह कौन सी योजना थी, जो उनके कार्यकाल में आगे नहीं बढ़ सकी? लोगों ने नहीं दिखायी दिलचस्पी।

उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी सरकार के दौरान शुरू की गयी उस योजना के बारे में बताया है, जो कि कामयाब नहीं हो पायी। प्रदेश में कांग्रेस सरकार के समय जब वे मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने गांव के धनवान लोग जो कि अपने गांव को छोड़कर शहरों, दूसरे राज्यों या विदेशों में जाकर बसे हैं, उन लोगों को अपने गांव से जोड़ने के लिए एक योजना शुरू की थी।

इस योजना का नाम मेरा गांव मेरा धन योजना था। इस योजना में उन धनवान लोगों की पूंजी से गांव का विकास करना शामिल था। इसमें उन्होंने यह भी प्रावधान कर रखा था कि जो अपने गांव में स्कूल, अस्पताल, सड़क, पेयजल योजना आदि किसी भी विकास कार्य में अपनी पूंजी लगा रहे हैं, वे अपने माता-पिता या प्रियजन के नाम पर इसका नामकरण कर सकते हैं। इस योजना में 2 वर्षों में प्रस्ताव न के बराबर ही मिल पाये। इस कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। नीचे पढ़िए उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने क्या कुछ लिखा अपनी इस योजना के बारे में?

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने लिखा है कि ‘‘मेरा गाॅव मेरा धन योजना आप हमेशा सफल नहीं होते, सफलता के साथ आने वाले समय के उपयोग के लिये विफलता पर भी कुछ लिखना आवश्यक है। कांग्रेस सरकार ने 2014 से 2016 तक कई अभिनव योजनाएं प्रारम्भ की। एक ऐसी ही योजना थी ‘‘मेरा धन-मेरा गाॅव’’। यह योजना गांव के प्रवासी बन्धुओं की गाॅव के विकास में सक्रिय बनाने के उद्वेश्य से प्रारम्भ की गई। इस योजना से मुझे बड़ी आशा थी। सरकार ने तय किया कि यदि कोई व्यक्ति अपने गाॅव से बाहर शहरों में या दूसरे राज्य व देशों में बसा है और अपने गाॅव के इर्द-गिर्द के क्षेत्र के विकास में पूंजीगत योगदान देना चाहता है तो इस हेतु कानूनी ढांचा तैयार किया जाय। हमारा उद्वेश्य था, गांव के धनाड्य लोगों की पूंजी को गांव की तरफ मोड़ना, ताकि उनका सक्रिय रिश्ता गाॅव से बना रहे। हमने यह माॅडल केरल से लिया। इस माॅडल के तहत यदि आप अपने गाॅव या निकट स्कूल, अस्पताल, सड़क, पेयजल योजना आदि कुछ भी बनाते हैं और उसका संरक्षण करते हैं तो आपकी खर्च पूंजी पर 12 प्रतिशत व्याज व संरक्षण का खर्चा दिया जाता है। इस बहाने व्यक्ति गाॅव से सक्रिय रूप से जुड़ा रहता है। हमने व्यय पूंजी पर 12.50 प्रतिशत व्याज के साथ-2 देख-रेख व्यय देने का भी फैसला लिया। हमने यह भी फैसला किया कि व्यक्ति द्वारा बनाये गये भवन या योजना का नामकरण अपने स्व. माता-पिता या प्रियजन के नाम पर करना चाहें तो कर सकते हैं। मैंने कई स्थानों पर प्रवासी बन्धुओं से योजना पर खुली चर्चा की। लोगों ने योजना को सराहा। मगर दो वर्षों में एकाध भूले-विसरे प्रस्ताव ही आगे आये। प्रवासियों को गाॅव व इलाके के साथ सक्रिय रूप से जोड़ने की मेरी यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई।”

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