(विश्व पर्यावरण दिवस) निरन्तर गहराता जा रहा है जल संकट, आने वाले समय में हो सकते हैं गंभीर परिणाम- डा0 आर0के0 श्रीवास्तव, पंतनगर विश्वविद्यालय

पर्यावरण संरक्षित तो जीवन सुरक्षित

पर्यावरण की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार या निजी संगठनों की न होकर बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी बने इसके लिए 1972 में संयुक्त राष्ट्र के द्वारा 5 से 16 जून को मानव पर्यावरण पर हुए सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने प्रत्येक वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का निर्णय लिया एवं सन्  1973 से हर वर्ष 5 जून को एक वर्षीय कार्यक्रम के रूप में अलग-अलग विषय (थीम) पर पर्यावरणीय मुद्दो को सुलझाने एवं मानव जीवन पर स्वास्थ और हरित पर्यावरण के महत्व के बारे में वैश्विक जागरूकता हेतु विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन इस दिवस पर किया जाता है। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस 2021 का विषय (थीम) – Ecolosystem Restoration (पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली)है।जिसमें क्षतिग्रस्त या नष्ट हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाने में सहयोग देना, नाजुक दौर से गुजर रहे पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण जैसी बातें शामिल हैं।

person watering outdoor plants
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 उत्तराखण्ड के उधम सिंह नगर जिले में पिछले 50-60 वर्षो से रह रहे लोगो को यह अच्छी तरह पता है कि तराई में कालोनाइजेशन स्कीम के अंतर्गत वसाये जाने की प्रक्रिया के दौरान कई स्थानों पर ’आर्टीजन बेल’ लगाये गये थे। आज वे कहां हैं और क्यों सूख गये, इस बात पर चर्चा और अध्ययन किये बगैर ही अब तराई के साथ भावर में भी ’डीप ड्रिलिंग’ कर धड़ाधड ट्यूबबेल खोदे जा रहे हैं और दिन दूनी रात चैगूनी बढ़ रही जनसंख्या की पेयजल समस्या का समाधान उनमें ढूंढा जा रहा है।

तराई के जंगलों को साफ कर सबसे पहले कालोनाइजेशन स्कीम लागू की गयी। आजादी के बाद हुए बंटवारे से पीड़ित हजारों परिवारों को यहां बसाया गया और हरित क्रांति का नया विगुल गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि विश्वविद्यालय के माध्यम से बजाया गया। यह जरूरी भी था और देश की कृषि व्यवस्था में एक क्रांतिकारी ओर महत्वपूर्ण परिवर्तन भी था, लेकिन इस क्रांति के साथ ही मनुष्य की भूख ने आसपास के जंगलों का भी सफाया कर डाला और भाबरी क्षेत्र के विशाल बनों का विनाश करती आदमी की भूख इस क्षेत्र को वृक्षविहीन करती जा रही है। वर्षा के जल को रोक कर अपनी गहरी जड़ों से धरती के गर्भ में पहुचाने वाले वृक्षों का सफाया हो गया है। कंक्रीट के उग आये जंगलों में पानी वहाया जा सकता है रोका नहीं जा सकता। जिन औद्योगिक महत्व के वृक्षों को तात्कालिक लाभ के लिए लगाया जा रहा हे वे जल संचय कर धरती को कुछ देने वाले नहीं, वरन वायुमंडल की नमी को भी सोखकर शुष्क बना देने वाले है और कथित विकास की दौड़ में हमे ऐसे ही वृक्षों को लगाने के लिए प्रेरित कर रही है।

तात्कालिक सुख के लिए चल रही विकास की यह दौड भावी पीढी को कितने बड़े विनाश की ओर ले जाएगी इसका अंदाजा अभी नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन यह निश्चित है कि आने वाले कुछ ही वर्षो में इसके परिणाम मिलने शुरू हो जाएंगें। पिछले कुछ दशकों में जाने-अनजाने मानव जाति धरती में पानी सोखने की क्षमता कम करती जा रही है और यह जलाभाव उसी का परिणाम है। धरती में पानी सोखने की क्षमता का मुख्य आधार गहराई तक जाने वाली जड़ो के वृक्ष हैं। देशी प्रजाति का वृक्ष जमीन से जितना उपर जाता है उसकी जड़े जमीन के भीतर उतनी ही गहराई तक जाल फैलाती हैं। जिन क्षेत्रों में इन पारंपरिक वृक्षों के बाग और जंगल समाप्त हो जाते हैं उन क्षेत्रों में वरसात का पानी सोखने की गति समाप्त हो जाती है और अधिकांश पानी नदी-नालों में भर कर वाढ़ व भूस्खलन की विभीषिका पैदा कर देता है।

प्रदेश में निरंतर गहराते जल संकट के लिए जिन कारकों को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है, उनमें जलस्रोतों का संरक्षण और पानी की उपलब्धता बढ़ाने की नीतियों को जलापूर्ति कार्यक्रमों से न जोड़ा जाना भी है। जल संकट का सामना करने के लिए अब वर्षा जल संग्रहण ही एकमात्र उपाय हे जिसे जल्द से जल्द जल संरक्षण कार्यक्रमों से जोड़ा जाना चाहिए। जल विज्ञानी भी कह चुके है कि वर्षा जल पूरी तरह पीने लायक है। वैसे तो आज जल-संकट दूर करने के नाम पर कुछ बहुत ही महंगी योजनाओं पर विचार हो रहा है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उपलब्ध साधनों का सबसे बेहतर उपयोग तालाबों और ऐसे ही अन्य परंमरागत जल-स्रोतों की मरम्मत और रख-रखाव में हो सकता है। किसी भी महंगी योजना में बहुत अधिक धन बहाने से पहले हमें पहले से बने तालाबों की मरम्मत और जीणोद्धार के बोरे में सोचना चाहिए। तालाबों से मनुष्यों के लिए प्रत्यक्ष पेयजल चाहें प्राप्त न किया जाए लेकिन वे आसपास की नमी, हरियाली और भूजल के स्तर को बढाकर गांव के बहुपक्षीय विकास की संभावना को भी बढातें है। तालाबों से मनुष्यों की जल संबंधी अनेक जरूरतें पूरी होती है।

सामाजिक, स्वैच्छिक संगठन तथा पर्यावरणविद् एवं जलविज्ञानी अर्से से यह मांग कर रहे है कि उपलब्ध पानी को पाइपों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुचाने भर से जल संकट का सामना नहीं किया जा सकता इसके लिए जल संग्रह और संरक्षण को जलापूर्ति कार्यक्रमों का हिस्सा बनाना होगा। उनका मानना हे कि वर्षा जल संग्रह उपायों से जल संकट का सामना किया जा सकता है। प्रयोगों से यह साबित हो चुका है कि वर्षा जल की गुणवत्ता पीने योग्य है। फिर भी लोग यदि इसका पेयजल के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहते तो अपने अन्य उपयोगों की पूर्ति हेतु वर्षा जलो का भंडारण कर बाद में उपयोग करके पेयजल पर पडने वाले दबाव को काफी कम कर सकते है। सरकार सिद्धांतः इन सुझावों को मान चुकी है और वर्षा जल संग्रह के अनेक प्रयास प्रयोग के तौर पर आरम्भ किए गए है। लेकिन नीतिगत तौर पर इसे अभी अमल में न लाए जाने से जल संकट का दिनों पर दिन विकराल रूप धारण होता जा रहा है।

राज्य में पानी की कुल जरूरत और उपलब्धता की तुलना की जाए तो आवश्यकता से कई गुना अतिरिक्त पानी यहां उपलब्ध है, लेकिन यह पानी नदियों और वर्फ के रूप में है जिसे लोगों तक पहुचाने के लिए संसाधन और तकनीक की अत्यधिक आवश्यकता होगी। नदियां घाटियों में बहती हैं और बस्तियां उचांई पर हैं इसलिए नदी जल का इस्तेमान आसान नहीं है। बस्तियों के आस पास जो जल स्रोत थे टैप कर लिए जाने के बाद भी उन जगहों पर पानी की समस्या फिर भी बनी हुई है। ऐसी स्थिति में सभी लोगों को पर्यावरण के प्रबंधन हेतु जोड़कर एवं उनके सहभागिता से ही वर्षा जल संग्रह एवं गंदे पानी का शुद्धिकरण कर ही जल स्रोतों में डालना, आने वाले भविष्य के लिए न्याय संगत एवं उचित होगा। धरती पर जीवन, प्रकृति के विभिन्न अंगो के बीच समुचित सन्तुलन पर निर्भर है। हर प्रकार के जीव और पेड़ पौधों का जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। प्रकृति के इसी परस्पर निर्भर जीवन चक्र का दूसरा नाम पर्यावरण है।

हजारो वर्षो से मानव जीवन पर्यावरण के सन्तुलन के सहारे चलता रहा है। लेकिन आधुनिक युग में जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये प्राकृतिक साधनों का दोहन तीव्र गति से हो रहा है। हाल के वर्षो में प्राकृतिक साधनों का दोहन के कारण जो गम्भीर समस्या पैदा हो गयी है उससे समस्त विश्व चिंतित है। आज दुनिया के देश इस बात को महसूस करने लगे हैं कि यदि इस खतरे का कारगर ढंग से मुकाबला नहीं किया गया तो हमारा विकास व्यर्थ हो जायेगा। अब लोग इस बात को मानने लगे है कि विकास और पर्यावरण का निकटतम सम्बन्ध है तथा पर्यावरण के बिना विकास अधूरा है। दुनियाॅ के विकासशील देशो विशेषकर भारत में प्राचीन काल में ही पर्यावरण का विशेष महत्व रहा है। लेकिन आधुनिकीकरण और आबादी के भारी दबाव के कारण पर्यावरण की जटिल समस्या पैदा हो गयी है।

इस समय देश मे पेयजल एवं जल की उपलब्धता का संकट जिस तरह दिन प्रति दिन बढता जा रहा है उससे भविष्य के प्रति अनेक तरह की आशंकाओं का जन्म लेना स्वाभाविक ही है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि यह स्थिति तब है जब देश के कई हिस्से बाढ़ अर्थात जल की अधिकता से भी तबाह हो जाते है तथा दूसरी तरफ जल की कमी से सूखा पड़ जाता है। अतः सूखे एवं बाढ़ के दोहरे प्रकोप, कृषि के पिछडेपन, भीषण गरीबी, अभाव और पलायन की समस्याओं से ग्रस्त क्षेत्रोंकी व्यापक संख्या है। प्रकृति प्रदत्त संसाधनों में जल सबसे महत्तपूर्ण संसाधन है क्योकि हम सभी अच्छी तरह जानते है कि जल ही जीवन है।

हमारी पृथ्वी पर एक अरब 40 घन किलो लीटर पानी है। इसमें से 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है जो खारा है, शेष 1.5 प्रतिशत पानी वर्फ के रूप में घ्रुव प्रदेशों में है। इसमें से वचा एक प्रतिशत पानी का 60वाॅ हिस्सा खेती और उद्योग कारखानो में खपत होता है। वाकी का 40वा हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ-सफाई में खर्च करते है। पानी के वारे में एक नहीं कई चैकाने वाले तथ्य है। विश्व में और विशेष रूप से भारत में पानी किस प्रकार नष्ट होता है इस विषय मंे जो तथ्य सामने आए हैं उस पर जागरूकता से ध्यान देकर हम उस पानी के अपव्यय को रोक सकते है। पानी का महत्व भारत के लिए कितना है यह हम इसी बात से जान सकते है कि हमारी भाषा में पानी के कितने अधिक मुहावरे हैं। आज पानी की स्थिति देखकर हमारे चेहरो का पानी तो उतर ही गया है, मरने के लिए भी अब चुल्लू भर पानी भी नहीं बचा, अब तो शर्म से चेहरा भी पानी-पानी नहीं होता, हमने बहुतों को पानी पिलाया, पर अब पानी हमें रूलाएगा, यह तय है।

भारत में जल संकट: सिकुड़ता जल भंडार

भारत में हर साल करीब 4000 अरब घन मीटर वर्षा और हिमपात होता है। परन्तु इसमें से केवल 1869 अरब घन मीटर बरसाती पानी उपयोग के लिए उपलब्ध रहता है और इसमें से वास्तविक रूप से केवल 690 अरब घन मीटर पानी का ही उपयोग हो पाता है और करीब 1179 अरब घन मीटर पानी बरसात के दिनों में बहकर समुद्र में पहुंच जाता है। अगर देश में उपलब्ध 432 अरब घन मीटर भूतलीय जल के साथ 690 अरब घन मीटर बरसाती पानी भी शामिल कर लिया जाए तो भारत को एक अरब से अधिक आबादी के लिए पानी की कुल वास्तविक उपलब्धता 1,112 अरब घन मीटर हो जाती है।

वर्षों से जनसंख्या में तीव्र वृद्धि तथा कृषि, उद्योग, नगर पालिकाओं और अन्य क्षेत्रों में पानी की आबादी की वढती खपत से भारत के स्वच्छ पेयजल स्रोतो पर बोझ बहुत बढ गया है। सिंचाई के लिए 90 प्रतिशत पानी भूमिगत जल स्रोतों से आता है। वाकी 7 प्रतिशत औद्योगिक कार्यो के लिए तथा 3 प्रतिशत घरेलू कार्यो में काम आता है। भारत के कई भागों में पानी की भीषण कमी, खेती योग्य भूमि की कमी, प्राकृतिक निवास संस्थानों के विनाश, पर्यावरण में खराबी ओर बडे़ पैमाने पर प्रदूषण से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा है और आर्थिक तथा सामाजिक प्रक्रिया खतरे में पड़ गयी है।

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय का अनुमान है कि वर्ष 2021 तक देश के प्रमुख 35 शहरों/ महानगरों में पानी की मांग दुगना बढ़कर 12906 करोड़ घन मीटर हो जाएगी, क्यांेकि इन शहरों की आबादी इस समय के 10.7 करोड़ की तुलना में 2021 में बढ़कर 20.2 करोड़ हो जाएगी। जबकि पेयजल की उपलब्धता 2001 के स्तर पर ही बने रहने का अनुमान है। नतीजा यह होगा कि बढ़ी हुई आबादी पानी को लेकर होने वाली लड़ाइयों के प्रति संवेदनशील बन जाएगी। इसी मंत्रालय के एक पूर्वानुमान के अनुसार 2025 तक गंगा आदि 11 नदियों के थालों में पानी की किल्लत पैदा हो जाएगी जिससे 90 करोड़ लोगों का जीवन खतरे में पड़ सकता है।

अतः एक तरफ पानी की कमी और दुसरी तरफ उपलब्ध पानी को प्रदूषित करते रहना वर्तमान एवं भविष्य के लिए एक नई समस्या दिन पर दिन बनती जा रही है। पानी के प्रदूषण को रोकने की दिशा में 1974 में भारत सरकार के जल (प्रदूषण निरोधक एवं नियंत्रण) अधिनियम बनाया था। यह पानी को प्रदूषित होने से रोकने की दिशा में एक सराहनीय कदम है, और इसका उद्देश्य पानी के प्रदूषण की रोकथाम करना और नियंत्रण करना है। लेकिन यह अधिनियम कहां तक सफल हो पाया है, यह हम अपने आस-पास पानी के हो रहे प्रदूषण को देखकर अंदाजा लगा सकते है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पानी को प्रदूषण से बचाने के लिए भी कोशिशें की जा रही है। सन् 1976 में बैंकूबर में ’हैबिटेट कांफ्रेंस’ में भारत समेत तमाम राष्ट्रों ने मिलकर संकल्प लिया था कि 1990 तक सभी को पाीने का शु़द्ध पानी उपलब्ध कराया जाए।

इसी उद्देश्य से मार्च 1977 में मारडेल प्लाटा में हुए संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन में इसे स्वीकृति प्रदान की गयी और 1980-90 की अवधि को ’अंतरराष्ट्रीय पेयजल आपूर्ति और स्वच्छता दशक’ के रूप में मानने का निर्णय किया गया था। भारत ने भी 1990-91 तक देश की जनता  को शुद्ध पीने के पानी और सफाई की न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध कराने के संकल्प पर हस्ताक्षर किये थे। पीने के पानी की सुलभ उपलब्धता के लिए देश में केन्द्र सरकार ने 1986 में न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम के अंतर्गत त्वरित ग्रामीण जलदाय कार्यक्रमों पर जोर देने के लिए राष्ट्रीय पेय जल मिशन का गठन किया गया था। लेकिन इन कोशिशों का क्या परिणाम निकला है, उनका अनुमान हम इससे लगा सकते है कि अभी भी भारत की 80 प्रतिशत आबादी को पीने का शु़द्ध पानी उपलब्ध नहीं है और वे प्रदूषित पानी पीने के लिए विवश है।

अतः अब जरूरत है कि पानी को प्रदूषित होने से रोकने के लिए कठोर उपाय किये जाएं, क्योकि पानी को प्रदूषण से बचाना हमारे लिए एक चुनौती है। औद्योगीकरण और नगरीकरण से पानी में प्रदूषण की मात्रा बढ़ती जा रही है। इसके अतिरिक्त उद्योगों को भी पानी को प्रदूषित होने से बचाने के लिए आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करने के लिए विवश किया जा सकता है। इसके लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा जल प्रदूषण (निरोधक एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 का पालन कठोरता से किया जाना उचित होगा। परन्तु इसके लिए सिर्फ कानूनों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है, तथा लोगों में भी जागृति लानी होगी। लोगों को इस बात की जानकारी देकर सहायता दी जा सकती है कि वे कैसे पानी संरक्षण एवं दूषित पानी को शु़द्ध करके अपने विभिन्न आवश्यकताओं में प्रयोग कर सकते है।

व्यक्तिगत स्तर के प्रयास से इसमें काफी मदद मिल सकती है। इसलिए भूमिगत पानी और नदी के पानी को अब और प्रदूषित होने से बचाने के लिए समय रहते ही प्रयास किया जाना चाहिए अन्यथा आने वाले वर्षो में भूमिगत पानी के पूर्णतया विषाक्त होने की संभावना है। अगर ऐसा हुआ तो हमारा संपूर्ण जीवन ही खतरे में पड़ जाएगा क्योकि पानी के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। पेयजल को प्रदूषित करने वाले रासायनिक अवयवों का उद्गम स्रोत हैं फैक्ट्रियों एवं घरों से निकलने वाला कचरा एवं त्यागा हुआ पानी जो नदी-नालांे में बिना किसी शुद्धिकरण के डाल दिया जाता है या फिर अनौपचारिक रास्ता भी है जैसे कल-कारखानों द्वारा निकलने वाले जहरीले धुएं का आकाश में जाना एवं फिर ’एसिड रेन’ द्वारा पृथ्वी पर वापस आकर जल प्रदूषण करना। घरों में शौचालयों को फलश करते समय जो पानी निकलता है या कपड़े धोते समय जो डिटजंेट युक्त पानी निकलता है वह सीवर द्वारा फिर से नदी-नालों में जाता है।

एक और विकराल समस्या है कृषि में प्रयुक्त होने वाले वो रसायन जिसमें खादें एवं कीटनाशक मुख्य है। यह भी सिंचाई के पानी या बरसात के पानी में घुलकर या तो भूगर्भीय जल को प्रदूषित करते है या फिर बहकर पास के नदी या नाले में चले जाते है। जल प्रदूषण जलाशयों में होने वाली प्राकृतिक क्रियाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जिसमें मुख्य है पानी में आॅक्सीजन की कमी हो जाना। होता यह है कि प्रदूषित जल में जो हानिकारक तत्व होते है उन्हें कुछ बैक्टीरिया हानिरहित तत्वों में तोडते है लेकिन उन बैक्टीरिया को अपने जीवन के लिए आक्सीजन की आवश्यकता होती है जो वह पानी से ही प्राप्त करते है। इस प्रकार पानी में आॅक्सीजन की कमी हो जाती है और ऐसे पानी में पाए जाने जीव-जंतु (मछलियां) समाप्त हो जाते है।

प्रदूषित जल में इसीलिए प्रायः वीओडी की मात्रा नापकर इस प्रकार के परिणामों का पता लगाया जाता है। दूसरी प्रक्रिया जो प्रदूषित जलाशयों में पायी जाती है वह है यूट्रीफिकेशन, कृषि में प्रयुक्त होने वाली रासायनिक खाद जब वहकर पानी में चली जाती है तो जलाशयों में शैवालों (एल्गी) की उपज बढ़ती चली जाती है यह शैवाल पानी की आंक्सीजन का उपयोग अपने जीवन के लिए कर लेते है और आक्सीजन की मात्रा कम हो जाने पर जलाशयों में जीव-जंतु, मछलियां आॅक्सीजन से वंचित रहकर प्रायः मरने लगती है।  फैक्टरियों एवं घरों से त्याग दिये जाने वाला पानी, कचरा, कृषि में प्रयुक्त होने वाली रासायनिक खाद एवं कीटनाशक रसायन मुख्यतः जल स्रोतो को प्रदूषित करते है।

अपने देश और ऐसे ही अन्य विकासशीत या अल्प विकसित देशों की समस्या कुछ विशिष्ट है जिसमें पानी में पाए जाने वाले जैविक कारक (ई कोलाई एवं कोलीफार्म बैक्टीरिया) मुख्य हैं। शौचालयों के अभाव में मनुष्य द्वारा खुले में इधर-उधर रेल पटरियों के किनारे, खेतों एवं जंगलों में मल-मूत्र विसर्जन करने से ये बैक्टीरिया पानी में चले जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य तकनीकी कारणो जैसे लैंडफिल साइटों को शहर में उत्पादित कचरे एवं अस्पतालों के कचरों से भरते समय सावधानियां, जैसे लैंडफिल साइटों की निचली सतह को लगभग लीक प्रूफ न किया जाना या बरसात के समय लैंडफिल साइट के उपर से नदी या नालों में बहकर जाने वाले पानी पर रोक। इसके अतिरिक्त एक और विशिष्ट कारण जैसे जल निगम द्वारा घरों में पाइपों द्वारा रूक-रूक कर 4 या 5 घंटों के लिए पानी की सप्लाई किया जाना। इसमें समस्या यह है कि जब पानी की सप्लाई हो रही होती है तब पानी के पाइपों में दबाव बढ़ा होता है, जब पानी की सप्लाई रूक जाती है तब यह दबाव निगेटिव हो जाता है और पानी के पाइपों में रिसाव द्वारा इधर-उधर का गन्दा पानी आ जाता है जिसमें तमाम तरह के बैक्टीरिया और वायरस पाए जाते है। फिर जब कुछ घंटों बाद दोबारा पानी की सप्लाई की जाती है तो यह गंदा एवं विषाणु युक्त पानी लोगों तक पहुंच जाते है।

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