क्या है आदिवासियों का सरहुल पर्व ? पंत विश्वविद्यालय में यूं मनाया गया सरहुल पर्व

पंत विश्वविद्यालय में आज सरहुल पर्व के उपलक्ष्य में कृषि विज्ञान केन्द्र, काशीपुर द्वारा कुलपति डा. मनमोहन सिंह चौहान की उपस्थिति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें आदिवासी युवा संगठन द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।

क्या है सरहुल पर्व

सरहुल पर्व मुख्यतः झारखंड और इसके आस-पास के इलाकों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख आदिवासी त्योहार है। यह त्योहार मुख्य रूप से सरना धर्म को मानने वाले आदिवासी समुदायों द्वारा मनाया जाता है। सरहुल का अर्थ है ‘साल के फूल’। यह पर्व वसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक होता है और साल वृक्ष के फूलने के समय मनाया जाता है।

सरहुल पर्व के मुख्य बिंदु:
1. **समय**: सरहुल पर्व चैत्र महीने की अमावस्या को मनाया जाता है, जो आमतौर पर मार्च-अप्रैल में पड़ता है।


2. **प्रकृति की पूजा**: इस त्योहार में आदिवासी लोग प्रकृति, विशेष रूप से साल वृक्ष और धरती माता की पूजा करते हैं। इसे धरती की नई जीवन शक्ति का स्वागत माना जाता है।


3. **रिवाज और परंपराएँ**:
   – **पूजा और अनुष्ठान**: गाँव के पुजारी (पाहन) साल वृक्ष के नीचे पूजा करते हैं और साल के नए फूलों को गाँव के देवताओं को अर्पित करते हैं।
   – **नृत्य और संगीत**: इस अवसर पर आदिवासी लोग पारंपरिक नृत्य और संगीत का आयोजन करते हैं। ढोल, मांदर और नागाड़े बजाकर सामूहिक नृत्य किया जाता है।
   – **भोज और सामूहिक भोजन**: पूरे गाँव के लोग एक साथ मिलकर पारंपरिक भोजन तैयार करते हैं और सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं।


4. **सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व**: सरहुल पर्व समाज में एकता और सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है। इस अवसर पर गाँव के सभी लोग एक साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं और सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।

सरहुल पर्व आदिवासी संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व न केवल प्रकृति के साथ जुड़ाव का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को भी संजोए रखने का माध्यम है।

इस अवसर पर नियत्रंक डा. आभा गरखाल, मुख्य महाप्रबंधक फार्म डा. जयंत सिंह, प्रबंध निदेशक डा. अजय प्रभाकर, सहायक इंजिनियर फार्म श्री वीकेश कुमार, डा. भाष्कर तिवारी, श्री मदन सिंह मेहरा, श्री रविन्द्र मिश्रा, श्री आर.एस. वर्मा, श्री आर.सी. वर्मा एवं डा. मोहन सिंह उपस्थित थे।

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